भारत प्रशासित कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को केंद्र सरकार ने ख़त्म
कर दिया है. अनुच्छेद 370 में इस बदलाव से एक दिन पहले ही राज्य में मोबाइल, इंटरनेट और लैंडलाइन सेवाएं बंद कर दी गईं.
वरिष्ठ पत्रकार
अनुराधा भसीन ने सुप्रीम कोर्ट में कश्मीर के हालात, वहां सभी संचार सेवाओं के बंद हो जाने से लोगों को हो रही परेशानी के साथ पत्रकारों और मीडिया के
काम करने की असमर्थता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है जिस पर शुक्रवार को सुनवाई हुई.सुनवाई के दौरान अनुराधा भसीन के वकील ने अदालत में कहा कि कश्मीर में कोई लैंडलाइन काम नहीं कर रहा है. वहां के हालात बहुत ख़राब हैं. इस याचिका में कश्मीर के लोगों के लिए फिर से मोबाइल, इंटरनेट और लैंडलाइन सेवा शुरू करने की बात है.
वकील ने चीफ़ जस्टीस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच से कहा कि हमारी याचिका का अनुच्छेद 370 से कोई लेना-देना नहीं है.
इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने छह याचिकाओं की सुनवाई स्थगित कर दी और अगली सुनवाई की तारीख़ तय नहीं की है.
इन छह याचिकाओं में से चार को दोषपूर्ण करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से इनमें संशोधन करके फिर से दायर करने के लिए कहा.
अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अनुराधा भसीन की याचिका के अलावा वकील एमएल शर्मा ने भी याचिका दायर की थी.
एमएल शर्मा ने केंद्र के फ़ैसले के एक दिन बाद 6 अगस्त को यह याचिका दायर की थी. वहीं अनुराधा भसीन ने अपनी याचिका 10 अगस्त को दायर की थी.
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई को यह कहकर टाल दिया था कि अभी स्थिति बहुत संवेदनशीन है इसे सामान्य बनाने के लिए कुछ समय दिया जाना चाहिए.
इसराइल ने अमरीका की दो मुसलमान महिला सांसदों के प्रवेश पर बैन लगा दिया है. ये महिलाएं प्रमुख रूप से इसराइल सरकार की आलोचक हैं.
इल्हान
उमर और रशीदा तलैब अगले हफ़्ते इसराइल के नियंत्रण वाले वेस्ट बैंक और
पूर्वी यरूशलम जाने वाली थीं. लेकिन इसराइल ने उनके प्रवेश को रोक दिया है.इल्हान उमर ने इसराइल के इस क़दम को लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान और मित्र राष्ट्रों के सरकारी अधिकारियों के लिए डरावनी प्रतिक्रिया बताया है.
इससे पहले राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने ट्विटर के ज़रिए इन महिला सांसदों के इसराइल में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए लिखा था कि इन्हें इसराइल में घुसने देना एक 'बड़ी कमज़ोरी' होगी.
ट्रंप ने ट्विटर पर लिखा, "इसराइल अगर आदरणीय उमर और आदरणीय तलैब को अपने देश में घुसने की इजाज़त देता है तो यह उसकी बड़ी कमज़ोरी होगी. ये दोनों सांसद इसराइल के लोगों से और यहूदियों से नफ़रत करती हैं और ऐसा कुछ भी नहीं किया जा सकता जो इनकी सोच बदल दे. मिनिसोटा और मिशिगन के लिए उन्हें दोबारा चुनना बहुत मुश्किल होगा. ये दोनों एक कलंक हैं."
इसराइल पर दिए बयान को लेकर उमर और तलैब दोनों की आलोचना की गई. लेकिन उन्होंने उन पर लगे यहूदी विरोधी होने के आरोपों से इनकार किया है.
गुरुवार को संवाददाताओं से बातचीत में ट्रंप ने कहा था कि वो सोच भी नहीं सकते हैं कि आख़िर इसराइल उन्हें अपने यहां क्यों आने की इजाज़त देगा.
इसराइल का क़ानून ऐसे किसी भी विदेशी को अपने देश में प्रवेश नहीं देता है जो इसराइल के ख़िलाफ़ किसी भी तरह के बहिष्कार की बात करता है. चाहे वो बहिष्कार आर्थिक, सांस्कृतिक या शैक्षणिक हो.
ये क़ानून फ़लस्तीन विभाजन अनुमोदन के बहिष्कार को दबाने का प्रयास करता है. इस फ़लस्तीन आंदोलन के प्रति यूरोप समेत अमरीका में समर्थन बढ़ा है.
इसराइल के अधिकारियों ने पहले कहा था कि चुने गए अमरीकी अधिकारियों के लिए यह अपवाद होगा लेकिन बाद में वो मुकर गए.
अमरीकी मीडिया के अनुसार इन महिला सांसदों की यह यात्रा रविवार से शुरू होने वाली थी जिसका अहम पड़ाव येरूशलम का वो संवेदनशील पहाड़ी पठार है जिसे यहूदी टेंपल माउंट और मुसलमान हरम अल-शरीफ़ के नाम से जानते हैं.
इस यात्रा में उनकी योजना फ़लस्तीन की शांति कार्यकर्ताओं से मुलाक़ात, येरुशलम और वेस्ट बैंक के शहर बेथलेहम, रामल्ला और हेब्रोन जाने की थी.
वेस्ट बैंक जाने की योजना फ़लस्तीन शांति वार्ताकार हनान अशरवी की अध्यक्षता वाली संस्था मिफ्ताह ने बनाई थी.
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